स्टिकर की कहानियां · भाग 1 · 1880 – 1994
“मीम” शब्द कहां से आया?
इसकी शुरुआत 1976 में जीन पर लिखी एक किताब से हुई — बिल्ली की तस्वीर पर कैप्शन लगने से कई दशक पहले।
आज मीम का मतलब है कैप्शन वाली कोई तस्वीर, रिएक्शन GIF, या वह स्टिकर जो आप जवाब टाइप करने के बजाय भेज देते हैं। लेकिन यह शब्द वेब से भी पुराना है, और इसे इंटरनेट पर मज़ाक करने वाले किसी व्यक्ति ने नहीं बनाया। इसे एक विकासवादी जीवविज्ञानी ने बनाया था, जिसे एक ऐसी चीज़ के लिए नाम चाहिए था जिसका अब तक कोई नाम नहीं था।
जीन की किताब में जन्मा एक शब्द
1976 में ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय के प्राणीविज्ञानी रिचर्ड डॉकिन्स ने द सेल्फ़िश जीन प्रकाशित की। किताब का ज़्यादातर हिस्सा जीवविज्ञान के बारे में है। इसका मुख्य विचार यह है कि विकास को जीन के नज़रिए से देखने पर वह सबसे अच्छी तरह समझ आता है: जीन जानकारी के टुकड़े हैं जो एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में कॉपी होते हैं, और जो रूप सबसे अच्छी तरह कॉपी होते हैं, वे समय के साथ और आम होते जाते हैं।
किताब के आख़िरी अध्याय, अध्याय 11 में, डॉकिन्स एक बड़ा सवाल पूछते हैं: क्या सिर्फ़ जीन ही इस तरह काम करते हैं? उन्होंने इंसानी संस्कृति की ओर इशारा किया। धुनें, तकिया-कलाम, फ़ैशन, मेहराब बनाने के तरीक़े — ये सब नकल के ज़रिए एक इंसान से दूसरे तक पहुंचते हैं। ये कॉपी होते हैं, रास्ते में थोड़ा बदलते हैं, और कुछ फैल जाते हैं जबकि कुछ ग़ायब हो जाते हैं।
यह वही पैटर्न है जो जीन में दिखता है, बस कहीं ज़्यादा तेज़ और बिना किसी रसायन के। डॉकिन्स को इसके लिए एक शब्द चाहिए था — उनके अपने शब्दों में, “सांस्कृतिक संचरण की एक इकाई, या नकल की एक इकाई” के लिए।
शब्द कैसे गढ़ा गया
उन्होंने यूनानी भाषा से शुरुआत की। mīmēma का अर्थ है “जिसकी नकल की गई हो”; अंग्रेज़ी के mime (मूकाभिनय) और mimic (नकल करना) भी इसी जड़ से निकले हैं। इससे बना mimeme। लेकिन वे gene (जीन) जैसा एक अक्षर वाला शब्द चाहते थे, इसलिए उन्होंने इसे छोटा करके meme बना दिया।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि इसमें memory (याददाश्त) या फ़्रेंच शब्द même (“वही”) की गूंज भी सुनी जा सकती है। और उच्चारण भी बताया: अंग्रेज़ी शब्द cream की तुक पर, एक ही अक्षर में — “मीम”। हिंदी में हम जो “मीम” बोलते हैं, वह ठीक यही उच्चारण है।
कोई चीज़ मीम कैसे बनती है?
डॉकिन्स का कहना यह नहीं था कि मीम मज़ेदार होते हैं। उनका कहना था कि कुछ विचार थोड़ा-बहुत जीवित चीज़ों की तरह बर्ताव करते हैं:
- वे कॉपी होते हैं। आप कोई बात सुनते हैं और दोहराते हैं; कोई आपको सुनता है और वही करता है।
- कॉपी पूरी तरह सही नहीं होती। लोग ग़लत सुनते हैं, छोटा करते हैं, रीमिक्स करते हैं और बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं, इसलिए हर कॉपी थोड़ी अलग होती है।
- कुछ रूप जीत जाते हैं। लोगों का ध्यान सीमित है। जो रूप याद रखने में आसान या आगे बढ़ाने में ज़्यादा मज़ेदार होते हैं, वे फैलते हैं; बाक़ी धुंधले पड़ जाते हैं।
कॉपी, बदलाव, मुक़ाबला — बस इतना ही चाहिए। इस परिभाषा के हिसाब से कोई चुटकुला, कोई डांस स्टेप या काग़ज़ का हवाई जहाज़ मोड़ने का कोई तरीक़ा भी मीम है। और स्टिकर भी।
पूरी तरह नया विचार नहीं
डॉकिन्स ने कभी यह दावा नहीं किया कि इस तरह सोचने वाले वे पहले व्यक्ति थे। 1880 में ही जीवविज्ञानी थॉमस हेनरी हक्सले ने लिखा था कि अस्तित्व के लिए संघर्ष बौद्धिक दुनिया में भी उतना ही होता है जितना भौतिक दुनिया में।
एक और भी पुराना शब्द है, जो हैरानी की हद तक मिलता-जुलता है। 1904 में जर्मन जीवविज्ञानी रिचर्ड सेमॉन ने Die Mneme प्रकाशित की (अंग्रेज़ी में यह 1924 में आई), जिसमें उन्होंने अनुभव द्वारा याददाश्त में छोड़े गए निशानों के लिए mneme शब्द इस्तेमाल किया। यह अलग विचार है, लेकिन दोनों की समानता की अक्सर चर्चा होती है। डॉकिन्स ने जो जोड़ा, वह था जीन से तुलना — और एक छोटा, ज़ुबान पर चढ़ जाने वाला शब्द, जिससे विचार को आगे बढ़ाना आसान हो गया। जैसा कि होना ही था, यह शब्द फिर ख़ुद एक मीम की तरह फैल गया।
विज्ञान के विचार से इंटरनेट तक
कई सालों तक “मीम” ज़्यादातर विज्ञान और दर्शन की दुनिया में ही रहा। मीमेटिक्स नाम के एक छोटे अकादमिक क्षेत्र ने इसे एक पूरा सिद्धांत बनाने की कोशिश की: Journal of Memetics 1997 से 2005 तक निकला, और मनोवैज्ञानिक सूज़न ब्लैकमोर ने 1999 में The Meme Machine प्रकाशित की।
इंटरनेट तक की छलांग एक वकील की वजह से लगी। 1990 में माइक गॉडविन ने ग़ौर किया कि यूज़नेट — शुरुआती इंटरनेट के चर्चा मंच — पर लंबी बहसें बार-बार इस पर ख़त्म होती थीं कि किसी की तुलना हिटलर या नाज़ियों से कर दी जाती थी। उन्होंने अपना एक नियम पेश किया, जिसे आज गॉडविन का नियम कहा जाता है, और इसे मीमेटिक्स का एक प्रयोग बताया। अक्टूबर 1994 में उन्होंने Wired में “Meme, Counter-meme” शीर्षक वाले निबंध में इसके बारे में लिखा।
ऑनलाइन दुनिया में इस शब्द को अपना असली घर मिल गया। शुरुआती इंटरनेट संस्कृति ठीक उन्हीं चीज़ों से बनी थी जिनका वर्णन डॉकिन्स ने किया था: चुटकुले, तस्वीरें और जुमले, जो एक फ़ोरम से दूसरे फ़ोरम तक कॉपी होते और रास्ते में बदलते जाते। अगले कुछ सालों में “मीम” का मतलब सबसे बढ़कर वे मज़ेदार तस्वीरें और वीडियो हो गया जो ऑनलाइन फैलते हैं। बाद में डॉकिन्स ने ख़ुद इंटरनेट मीम को “मूल विचार का अपहरण” कहा — एक ऐसा अपहरण जो असल में उनकी बात को ही साबित करता है, क्योंकि यह शब्द कॉपी होते-होते बदल गया, ठीक वैसे ही जैसे किसी मीम को बदलना चाहिए।
तो फिर, मीम क्या है?
डॉकिन्स के अर्थ में: हर वह चीज़ जो एक दिमाग़ से दूसरे दिमाग़ में कॉपी होती है, रास्ते में थोड़ी बदलती है, और तब तक ज़िंदा रहती है जब तक लोग उसे आगे बढ़ाते रहते हैं। कैप्शन वाली बिल्ली की तस्वीर इसका एक रूप है। कोई तकिया-कलाम भी, कोई डांस, कोई धुन जो दिमाग़ से निकलती ही नहीं — और हर वह स्टिकर जो आप किसी दोस्त को फ़ॉरवर्ड करते हैं।
इस सीरीज़ में आगे: इंटरनेट से पहले मीम कैसे दिखते थे — दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दीवारों पर बनाए गए एक कार्टून चेहरे से लेकर फ़ोटोकॉपी के सहारे दफ़्तरों में घूमने वाले चुटकुलों तक।
स्रोत
- रिचर्ड डॉकिन्स, द सेल्फ़िश जीन (The Selfish Gene), ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1976 — अध्याय 11
- माइक गॉडविन, “Meme, Counter-meme”, Wired, खंड 2, अंक 10, 1 अक्टूबर 1994
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी) — Meme
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी) — The Selfish Gene
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी) — Internet meme
- विकिपीडिया (अंग्रेज़ी) — Godwin’s law